Komi Ekta In Hindi Essay On Paropkar

Posted on by Muhn

कौमी एकता सप्ताह 2018

कौमी एकता सप्ताह 2018 में सोमवार (19 नवंबर) से रविवार (25 नवंबर) तक मनाया जाएगा।

कौमी एकता सप्ताह

कौमी एकता सप्ताह या राष्ट्रीय एकता सप्ताह पूरे भारत में हर साल 19 नवंबर से 25 नवंबर तक मनाया जाता है। कौमी एकता सप्ताह के पूरे सप्ताह के समारोह के दौरान विशिष्ट विषयों से संबंधित प्रत्येक दिन विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। कुछ कार्यक्रम जैसे बैठकों, सेमिनारों, संगोष्ठियों, विशेष रूप से महान कार्यों, सांस्कृतिक गतिविधियाँ इस समारोह की विषय-वस्तु (राष्ट्रीय एकता या कौमी एकता सप्ताह, धर्मनिरपेक्षता, अहिंसा, भाषाई सौहार्द, विरोधी सांप्रदायिकता, सांस्कृतिक एकता, कमजोर वर्गों के विकास और खुशहाली, अल्पसंख्यकों के महिला और संरक्षण के मुद्दों) को उजागर करने के लिए आयोजित की जाती है। सप्ताह के उत्सव राष्ट्रीय एकता की शपथ के साथ शुरू होता है।

कौमी एकता सप्ताह और सार्वजनिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता की ताकत को मजबूत करने के लिए और बढ़ावा देने के लिये मनाया जाता है। पूरे सप्ताह का समारोह पुरानी परंपराओं, संस्कृति और सहिष्णुता की कीमत और भाईचारे की भारतीय समाज में एक बहु-धार्मिक और बहु सांस्कृतिक धर्मों की पुष्टि करने के लिए सभी को एक नया अवसर प्रदान करता है। ये सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए भी देश में निहित शक्ति और लचीलेपन को उजागर करने में सहायता करता है।

राष्ट्रीय एकता समारोह के दौरान भारत की स्वतंत्रता और ईमानदारी को संरक्षण और मजबूत करने की प्रतिज्ञा ली जाती है। प्रतिज्ञा में ये दृढ़ निश्चय किया जाता है कि सभी प्रकार के मतभेदों के साथ ही भाषा, संस्कृति, धर्म, क्षेत्र और राजनीतिक आपत्तियों के विवादों को निपटाने के लिये अहिंसा, शांति और विश्वास को जारी रखा जायेगा।

पूरे सप्ताह समारोह के शीर्षक हैं:

  • 19 नवंबर को राष्ट्रीय एकता दिवस।
  • 20 नवंबर को अल्पसंख्यक कल्याण दिवस।
  • 21 नवंबर को भाषाई सद्भाव दिवस।
  • 22 नवंबर को कमजोर वर्गों का दिवस।
  • 23 नवंबर को सांस्कृतिक एकता दिवस।
  • 24 नवंबर को महिला दिवस।
  • 25 नवंबर को संरक्षण दिवस।

कौमी एकता सप्ताह भारत में कैसे मनाया जाता है

कौमी एकता सप्ताह समारोह की शुरुआत चिह्नित करने के लिए प्रशासन द्वारा एक साइकिल रैली आयोजित की जाती है। पूरे सप्ताह के समारोह का उद्देश्य पूरे भारत में अलग संस्कृति के लोगों के बीच अखंडता, प्रेम, सद्भाव और भाईचारे की भावना का प्रसार करना है। साइकिल रैली में पूरे देश से विभिन्न स्कूलों से छात्र और गैर सरकारी संगठनों से स्वयंसेवक भाग लेते हैं।

कौमी एकता सप्ताह भारत में क्यों मनाया जाता है

कौमी एकता सप्ताह हर साल देश की विविधता (लगभग 66 भाषायें, 22 धर्मों, 29 राज्यों और अनेक जातियों) में एकता को बढ़ावा देने के लिये मनाया जाता है। ये राष्ट्र के निर्माण में मूल्यों और महिलाओं की भूमिका पर प्रकाश डालने के लिये मनाया जाता है। ये विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से महिलाओं की सामाजिक स्थिति के स्तर को बढ़ाने पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करता है। आम जनता को देश में दोनों मुद्दों लैंगिक समानता और अधिकारों के बारे में पता होना चाहिये और उनको समझना चाहिए।


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राष्ट्रीय एकता दिवस

‘महापुण्य उपकार है, महापाप अपकार’

परोपकार-पर उपकार का अर्थ है- ‘दूसरों के हित के लिये।’ परोपकार मानव का सबसे बड़ा धर्म है। स्वार्थ के दायरे से निकलकर व्यक्ति जब दूसरों की भलाई के विषय में सोचता है, दूसरों के लिये कार्य करता है। इसी को परोपकार कहते हैं।

भगवान सबसे बड़ा परोपकारी है जिसने हमारे कल्याण के लिये संसार का निर्माण किया। प्रकृति का प्रत्येक अंश परोपकार की शिक्षा देता प्रतीत होता है। सूर्य और चांद हमें जीवन प्रकाश देते हैं। नदियाँ अपने जल से हमारी प्यास बुझाती हैं। गाय भैंस हमारे लिये दूध देती हैं। बादल धरती के लिये झूम कर बरसता है। फूल अपनी सुगन्ध से दूसरों का जीवन सुगन्धित करते हैं।

परोपकार दैवी गुण है। इंसान स्वभाव से परोपकारी है। किन्तु स्वार्थ और संकीर्ण सोच ने आज सम्पूर्ण मानव जाति को अपने में ही केन्द्रित कर दिया है। मानव अपने और अपनों के चक्कर में उलझ कर आत्मकेन्द्रित हो गया है। उसकी उन्नति रूक गयी है। अगर व्यक्ति अपने साथ साथ दूसरों के विषय में भी सोचे तो दुनिया की सभी बुराइयाँ, लालच, ईर्ष्या, स्वार्थ और वैर लुप्त हो जायें।

महर्षि दधीचि ने राजा इन्द्र के कहने पर देवताओं की रक्षा के लिये अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनकी हड्डियों से वज्र बना जिससे राक्षसों का नाश हुआ। राजा शिवि के बलिदान को कौन नहीं जानता जिन्होंने एक कबूतर की प्राण रक्षा के लिये अपने शरीर को काट काट कर दे दिया।

परोपकारी मनुष्य स्वभाव से ही उत्तम प्रवृति का होता है। उसे दूसरों को सुख देकर आनंद महसूस होता है। भटके को राह दिखाना, समय पर ठीक सलाह देना, यह भी परोपकार के काम हैं। सामर्थ्य होने पर व्यक्ति दूसरों की शिक्षा, भोजन, वस्त्र, आवास, धन का दान कर उनका भला कर सकता है।

परोपकार करने से यश बढ़ता है। दुआयें मिलती हैं। सम्मान प्राप्त होता है। तुलसीदास जी ने कहा है-

‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधभाई।’

जिसका अर्थ है- दूसरों के भला करना सबसे महान धर्म है और दूसरों की दुख देना महा पाप है। अतः हमें हमेशा परोपकार करते रहना चाहिए। यही एक मनुष्य का परम कर्तव्य है।

200 शब्दों में निबंध

परोपकार शब्द का अर्थ है दूसरों का उपकार यानि औरों के हित में किया गया कार्य. हमारी ज़िंदगी में परोपकार का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है. यहाँ तक कि प्रकृति भी हमें परोपकार करने के हजारों उदाहरण देती है जैसा कि इस दोहे में भी बताया गया है कि :-
“वृक्ष कभू नहीं फल भखे, नदी न संचय नीर,
परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर”
वृक्ष अपने फल स्वयं कभी नहीं खाते, नदियां अपना जल स्वयं कभी नहीं इकठ्ठा करती, इसी प्रकार सज्जन पुरुष परमार्थ के कामों यानि परोपकार के लिए ही जन्म लेते हैं.

हमें भी प्रकृति से प्रेरणा लेकर ऐसे कार्य करने चाहिए जिनसे किसी और का भला हो. अपने लिए तो सभी जीते हैं किन्तु वह जीवन जो औरों की सहायता में बीते, सार्थक जीवन है.

उदाहरण के लिए किसान हमारे लिए अन्न उपजाते हैं, सैनिक प्राणों की बाजी लगा कर देश की रक्षा करते हैं. परोपकार किये बिना जीना निरर्थक है. स्वामी विवेकानद, स्वामी दयानन्द, गांधी जी, रविन्द्र नाथ टैगोर जैसे महान पुरुषों का जीवन परोपकार की एक जीती जागती मिसाल है. ये महापुरुष आज भी वंदनीय हैं.

तुलसीदास जी ने कहा है कि :-
“परहित सरिस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई”


इस लेख के लेखक का नाम रेहान अहमद है! यदि आप भी अपने लेख को हिंदी वार्ता पर प्रकाशित करना चाहते हैं तो कृपया इस फॉर्म के माध्यम से अपना लेख हमें भेजें! संशोधन के पश्चात (२४ घंटे के भीतर) हम आपके लेख को आपने नाम के साथ प्रकाशित करेंगे! आप चाहें तो हमें ईमेल के माध्यम से भी अपना लेख भेज सकते हैं ! हमारा पता है hindivarta@gmail.com

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